सांस्कृतिक आत्मविश्वास है आध्यात्मिक आत्मविश्वास का आधार

जब हम कोई काम शुरू करते हैं तो आत्मविश्वास बहुत जरूरी है। हम जिस करियर में लगे हैं और जिन सिद्धांतों का हम पालन करते हैं, उन पर हमें गहरा विश्वास होना चाहिए। लेकिन, सांस्कृतिक आत्मविश्वास हमारे आध्यात्मिक आत्मविश्वास का आधार है। चीन और भारत के लोग के लिए, जो लंबे समय से साम्राज्यवादी और.

जब हम कोई काम शुरू करते हैं तो आत्मविश्वास बहुत जरूरी है। हम जिस करियर में लगे हैं और जिन सिद्धांतों का हम पालन करते हैं, उन पर हमें गहरा विश्वास होना चाहिए। लेकिन, सांस्कृतिक आत्मविश्वास हमारे आध्यात्मिक आत्मविश्वास का आधार है। चीन और भारत के लोग के लिए, जो लंबे समय से साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक उत्पीड़न से पीड़ित थे, राष्ट्रीय हीन की भावना सबसे हानिकारक चीज़ है। बिना दूर किये इस मानसिकता से हम आत्मविश्वास के साथ आधुनिकीकरण की ओर नहीं बढ़ पाएंगे।

चाहे वह दैनिक जीवन हो, भोजन हो, या पारंपरिक त्योहार हों, हमारे और दूसरे देशों के बीच हमेशा मतभेद रहते हैं। हालाँकि, हमारे पास हमेशा ऐसे लोग होते हैं जो मानते हैं कि पश्चिम द्वारा पैदा की गई कोई भी चीज़ श्रेष्ठ होनी चाहिए। इस तरह के विचार को स्वाभाविक रूप से खारिज किया जाता है और आलोचना की जाती है। लेकिन, इसका गहराई से विश्लेषण करके हम पाते हैं कि जो लोग हमेशा पश्चिम के बारे में अच्छी बातें कहते हैं, उनका आत्म-सम्मान बहुत कम होता है। उनमें अत्यधिक राष्ट्रीय हीन भावना है। उन्हें सदैव विश्वास ​​है कि विदेशी चीजें उनके अपने देश की चीजों से बेहतर हैं। चरम मामलों में, यह हानिकारक मानसिकता वास्तव में राष्ट्रीय हितों के साथ विश्वासघात कर सकती है।

वास्तव में, यदि हम दुनिया भर के विभिन्न देशों की संस्कृतियों का तर्कसंगत विश्लेषण करते हैं, तो हम पाएंगे कि विभिन्न सांस्कृतिक घटनाएं वास्तव में इतिहास तथा स्थानीय परिवेश से आती हैं। उदाहरण के लिए, चीनी, भारतीय और पश्चिमी लोगों की खाने की आदतें बहुत अलग हैं। हालांकि वे एक ही सामग्री खाते हैं, विभिन्न मसालों और खाना पकाने के अलग तरीकों के कारण, चीनी भोजन का स्वाद भारतीय भोजन और पश्चिमी भोजन से अलग होता है। इस्तेमाल किए जाने वाले टेबलवेयर और खाने का तरीका भी अलग-अलग हैं। यह सब इस तथ्य से उपजा है कि वे अलग-अलग वातावरण में रहते हैं। खाद्य संस्कृति से हम यह देख सकते हैं कि जो लोगों के लिए उपयुक्त है वह सबसे अच्छा होता है, भले ही वह कैसा रूप दिखता है।

संस्कृति किसी राष्ट्र के आध्यात्मिक मूल्यों को दर्शाती है। चीनी और भारतीय लोगों ने हमेशा मनुष्य और प्रकृति के सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व और प्रकृति और समाज के संतुलित विकास पर जोर दिया है, हमारे पास वसुधैव कुटुम्बकम् की समान अवधारणाएं हैं। जो पश्चिम केऔपनिवेशिक इतिहास से बिल्कुल अलग है। पारंपरिक संस्कृतियां हमारे जीवन को रंगबिरंगे और अर्थवान बनाती हैं, और ये सभी चीजें हैं जिन पर हमें गर्व है। वैश्वीकरण के विकास के चलते, संस्कृतियों का एकीकरण भी अपरिहार्य है। हमें पूरा विश्वास है कि भविष्य में एशिया की संस्कृतियां विश्व में सबसे शानदार तौर पर चमकती रहेंगी।  

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

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