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शराब की बोतल पर रवींद्रनाथ टैगोर की कविता, खरीदने से लेकर बेचने वालों के बीच चर्चा

April 16, 2025

शराब की बोतल पर रवींद्रनाथ टैगोर की कविता, खरीदने से लेकर बेचने वालों के बीच चर्चा

नेशनल डेस्क :  पश्चिम बंगाल में मंगलवार को बांगला नववर्ष धूमधाम से मनाया गया। सोशल मीडिया से लेकर वाट्सएप तक, हर किसी ने अपने सगे-संबंधियों को बांगला नववर्ष की शुभकामनाएं दीं। इस मौके पर शराब के ठेकों और बार में लोग खास ब्रांड की विस्की खरीदते और पीते हुए नजर आए। लेकिन इस बार जो चीज़ चर्चा का विषय बनी, वह थी शराब की बोतल पर लिखी कविता। यह कविता रवींद्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध कविता “दुई पाखी” की कुछ पंक्तियां थीं, जो शराब की बोतल पर छपी हुई थी। आइए जानते है इस खबर को विस्तार से…

शराब पर छपी टैगोर की कविता…

आपको बता दें कि  लोग शराब की बोतल पर रवींद्रनाथ टैगोर की कविता की पंक्तियां पढ़कर अपनी-अपनी राय बनाने लगे। कवि की इन पंक्तियों को लेकर शराब खरीदने वालों से लेकर बेचने और पीने वालों तक के बीच चर्चा का माहौल था। हर कोई इन पंक्तियों के शब्दों में उलझा हुआ था और अपने जीवन से जोड़कर उन्हें समझने की कोशिश कर रहा था। इसी बीच, बांगला पखो (Bangla Pokkho) के पश्चिम बर्धमान जिला सभापति, अखय बनर्जी ने शराब कंपनी के खिलाफ कड़ी निंदा की और उन्हें खुली चेतावनी दी।

शराब कंपनी को चेतावनी

उन्होंने कहा कि बंगाल में हर दीवार, दुकान, कल-कारखाने और वाहनों पर बांगला भाषा में लिखा जाना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि शराब कंपनियां अपनी शराब की बोतलों को बेचने के लिए रवींद्रनाथ टैगोर की कविता की पंक्तियां इस्तेमाल करें। उन्होंने शराब कंपनी को चेतावनी दी कि यदि वह जल्द से जल्द बोतलों से यह कविता हटा ले, तो ठीक वरना वे सड़क पर प्रदर्शन करेंगे और कंपनी के खिलाफ डिपोटेशन भी देंगे।

“दुई पाखी” कविता का अर्थ

दरअसल, जो पंक्तियां शराब की बोतल पर छपी थीं, वे रवींद्रनाथ टैगोर की कविता “दुई पाखी” से थीं। इस कविता का दार्शनिक अर्थ है कि दो पक्षी हैं – एक पिंजरे में बंद है, जबकि दूसरा जंगल में उड़ता है। एक दिन दोनों की मुलाकात होती है, और जंगल में रहने वाला पक्षी पिंजरे के पक्षी से कहता है कि वह दोनों साथ में जंगल में चलें। लेकिन पिंजरे का पक्षी जवाब देता है कि वह पिंजरे में ही रहेगा। अंत में जंगल का पक्षी कहता है, “मैं कभी जंजीरों में नहीं बंधूंगी”। इस कविता में एक दार्शनिक दृष्टिकोण और मार्मिक संदेश है, जिसे पूरी कविता पढ़ने के बाद समझा जा सकता है।

लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं

वहीं अब इस पूरे मामले पर कुछ लोगों का कहना था कि बांगला नववर्ष के मौके पर शराब बनाने वाली कंपनी द्वारा यह एक अच्छा उपहार था, जो बंगाली समाज को दिया गया। वहीं दूसरी ओर, कुछ लोगों का कहना था कि रवींद्रनाथ टैगोर जैसी विश्वविख्यात शख्सियत की बहुचर्चित कविता को शराब की बोतल पर इस तरह इस्तेमाल किया गया, यह गलत था। उनका मानना था कि यह कदम कवि की छवि को धूमिल करने का प्रयास था, खासकर जब बांगला नववर्ष को धूमधाम से मनाया जाता है।

एक विवादित कदम

वक्फ कानून की तरह, अब यह विवाद भी शराब और संस्कृति के बीच एक ताजा टकराव बन गया है। जहां एक ओर लोग इसे एक अच्छे मौके के रूप में देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इसे एक गलत कदम माना जा रहा है। अब यह देखना होगा कि क्या शराब कंपनी इस विवाद को सुलझाने के लिए कुछ कदम उठाती है या यह और बढ़ता जाएगा।

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