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विकास मॉडल का सच : अनाज के ढेर पर भूखी दुनिया

सभ्यता की चकाचौंध के बीच दुनिया एक खामोश त्रासदी जी रही है। खेतों में रिकॉर्ड अनाज उग रहा है, खाद्य कंपनियां लगातार विस्तार कर रही हैं और बाजार रंग-बिरंगे पैकेटों से भरे पड़े हैं, फिर भी करोड़ों लोग भूख की यातना सहने को मजबूर हैं।

विकास के खोखले मॉडल की हार

यह केवल आर्थिक विषमता नहीं, बल्कि विकास के खोखले मॉडल की सबसे बड़ी हार है। अधिक उत्पादन की लालसा ने जंगल उजाड़े, जलस्रोत खत्म किए और मिट्टी की जीवनशक्ति घटा दी। अब प्रकृति भी उसी विनाश का जवाब दे रही है। कहीं लू फसलें झुलसा रही है तो कहीं बाढ़ महीनों की मेहनत बहा ले जाती है। भूख और पर्यावरण विनाश का यह दुष्चक्र अब इतना भयावह हो चुका है कि यदि इसे समय रहते नहीं तोड़ा गया, तो आने वाला दौर मानव इतिहास का सबसे अंधकारमय अध्याय बन सकता है।

10 देशोें में सिमटी है भूख

मानव सभ्यता की सबसे भयावह तस्वीर आज आंकड़ों में कैद दिखाई देती है। वर्ष 2025 में लगभग 266 मिलियन लोग तीव्र खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे थे, जबकि संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 673 मिलियन लोग लगातार भूख का सामना कर रहे हैं। अफ्रीका में हर पांचवां व्यक्ति भोजन संकट में जी रहा है। 35.5 मिलियन बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और करीब 10 मिलियन गंभीर स्थिति में हैं। सबसे दर्दनाक तथ्य यह है कि दुनिया की अधिकतर भूख केवल 10 देशों में सिमट चुकी है।

यह भूख नहीं, व्यवस्था की विफलता

यह केवल भोजन की कमी नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है। युद्ध, आर्थिक संकट, बेरोजगारी और जलवायु आपदाएं मिलकर भूख को ऐसा हथियार बना चुकी हैं, जो इंसानी अस्तित्व को भीतर से तोड़ रहा है। अब भूख किसी गरीब राष्ट्र की समस्या नहीं, बल्कि असंतुलित वैश्विक विकास का सबसे भयावह चेहरा बन चुकी है। मानवता को भोजन देने वाली व्यवस्था अब पृथ्वी के विनाश का बड़ा कारण बन चुकी है। वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 26 प्रतिशत हिस्सा खाद्य प्रणाली से आता है। कृषि अकेले पृथ्वी की आधी रहने योग्य भूमि और 70 प्रतिशत मीठे पानी का उपयोग करती है।

एग्रीफूड सिस्टम से कार्बन का उत्सर्जन

वर्ष 2022 में एग्रीफूड सिस्टम ने करीब 16.2 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष उत्सर्जन किया था। पशुपालन से निकलने वाली मीथेन, रासायनिक उर्वरकों से पैदा नाइट्रस ऑक्साइड और जंगलों की कटाई से बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड धरती को लगातार गर्म कर रही हैं। तापमान में हर अतिरिक्त डिग्री वृद्धि प्रति व्यक्ति लगभग 120 कैलोरी प्रतिदिन घटा देती है। यानी अधिक उत्पादन की दौड़ ही भविष्य का भोजन निगल रही है।

जलवायु चक्र में बदलाव भी भयावह

बदलता जलवायु चक्र अब भूख को और भयावह बना रहा है। मौसम अब अनुमान नहीं, भय का विषय बन चुका है। कहीं महीनों तक बारिश नहीं होती तो कहीं कुछ घंटों की वर्षा पूरी खेती बहा ले जाती है। लू, सूखा, चक्रवात और बाढ़ लगातार फसलों को नष्ट कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अमीर देशों में 41 प्रतिशत और गरीब देशों में 28 प्रतिशत तक उपज क्षमता घट सकती है। सबसे बड़ा संकट छोटे किसानों पर है, जिनके पास न आधुनिक तकनीक, न बीमा और न पर्याप्त संसाधन हैं। कई संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में भूख को हथियार बनाया जा रहा है। यदि यही स्थिति रही, तो वर्ष 2030 तक लगभग 512 मिलियन लोग भूख की चपेट में आ सकते हैं। पर्यावरण विनाश और भूख अब एक ही संकट के दो चेहरे हैं।

असंतुलन है सबसे बड़ी विडंबना

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक ओर करोड़ों लोग भूखे सोते हैं, वहीं दूसरी ओर भोजन कूड़े में फेंक दिया जाता है। दुनिया में उत्पादित भोजन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा बर्बाद हो जाता है। यह अपव्यय 8-10 प्रतिशत उत्सर्जन के बराबर है। अमीर देशों की थालियों से फेंका गया भोजन गरीब देशों के बच्चों की भूख बनता है। उधर मिट्टी की उर्वरता घट रही है, भूजल स्तर गिर रहा है और जैव विविधता खत्म हो रही है। रासायनिक खेती ने उत्पादन बढ़ाया लेकिन मिट्टी कमजोर की। अब टिकाऊ विकल्प जरूरी हैं। यदि दुनिया को इस संकट से निकलना है, तो भोजन को व्यापार नहीं, मानव अस्तित्व की जिम्मेदारी मानना होगा। अन्यथा भूख का यह संकट वैश्विक स्थिरता तोड़ देगा।

अब कृषि ही सबसे बड़ी आशा

विनाश के बढ़ते साये में रिजनरेटिव कृषि सबसे बड़ी आशा बन चुकी है। यह केवल खेती की तकनीक नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन की नई राह है। कवर क्रॉपिंग, फसल चक्रण, नो-टिल फार्मिंग, एग्रोफॉरेस्ट्री और प्रिसीजन फार्मिंग मिट्टी को फिर जीवंत बना रही हैं। स्वस्थ मिट्टी अधिक कार्बन सोखती है, कम पानी में बेहतर उत्पादन देती है और जलवायु संकट झेलने की क्षमता बढ़ाती है। माइक्रोबियल इनोकुलेशन और विविध फसल प्रणाली जैव विविधता मजबूत कर रही हैं। क्लाइमेट-स्मार्ट कृषि छोटे किसानों को मौसम पूर्वानुमान, सटीक सिंचाई और बेहतर बाजार से जोड़ रही है। शोध बताते हैं कि सूखे में भी रिजनरेटिव खेत पारंपरिक खेतों से अधिक उत्पादक रहे। यह संकेत है कि प्रकृति के साथ चलने वाली खेती केवल भोजन नहीं, भविष्य भी बचा सकती है।

सोच में बदलाव से ही उम्मीद

समाधान केवल नई तकनीकों से नहीं निकलेगा, जब तक नीतियों और सामाजिक सोच में बदलाव नहीं आता। सरकारों को पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली सब्सिडी खत्म करनी होंगी और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना होगा। अंतरराष्ट्रीय सहयोग, हरित कृषि कोष और तकनीकी ज्ञान का साझा उपयोग गरीब देशों को नई दिशा दे सकता है। उपभोक्ताओं की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। भोजन की बर्बादी रोकना, स्थानीय पौष्टिक आहार अपनाना और अनावश्यक उपभोग घटाना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है। साहसिक कदमों से 2030 तक भूख काफी नियंत्रित हो सकती है और जलवायु लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं। यह संघर्ष केवल खेतों में नहीं, बल्कि हमारी आदतों, नीतियों और प्राथमिकताओं में भी लड़ा जाएगा।

धरती के भविष्य से मानवता को कटघरे में

धरती का भविष्य आज मानवता के फैसलों के कटघरे में खड़ा है। एक ओर अधिक उत्पादन की अंधी दौड़ है, जो प्रकृति को नष्ट कर मानवता को भूख की ओर धकेल रही है। दूसरी ओर संतुलन और सतत विकास का मार्ग है, जहां भोजन और पर्यावरण साथ चलते हैं। ग्लोबल हंगर का नया चेहरा चेतावनी दे रहा है कि समय तेजी से खत्म हो रहा है। यदि हमने अब भी सोच नहीं बदली, तो आने वाली पीढ़ियां हरियाली को केवल किताबों में देखेंगी। लेकिन यदि दुनिया ने साहस दिखाया, तो यही संकट इतिहास का बड़ा परिवर्तन बन सकता है। आज का निर्णय तय करेगा कि भविष्य हमें विनाशकारी पीढ़ी कहेगा या वह पीढ़ी, जिसने भूख और पर्यावरण विनाश का घातक चक्र तोड़ दिया।
-प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

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