आज के समय में मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। सुबह उठते ही फोन देखना और रात को सोने से पहले तक स्क्रीन पर बने रहना अब आम आदत बन गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह बढ़ता स्क्रीन टाइम हमारी सोच और व्यवहार को बदल रहा है?
धीरे-धीरे बदलती सोच
लगातार स्क्रीन पर रहने से हमारी सोचने की आदत पर असर पड़ने लगता है। छोटे-छोटे वीडियो, तेजी से बदलती जानकारी और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन दिमाग को हर समय व्यस्त रखते हैं। इसका असर यह होता है कि हम गहराई से सोचने के बजाय जल्दी-जल्दी चीजें समझने के आदी हो जाते हैं। धीरे-धीरे ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम होने लगती है।
धैर्य होता जा रहा कम
जब हर जानकारी कुछ सेकंड में मिल जाती है, तो इंतजार करने की आदत कम होने लगती है। पहले जहां लोग किसी चीज को समझने या सीखने में समय लगाते थे वहीं अब सब कुछ तुरंत चाहिए होता है। इससे धैर्य पर असर पड़ता है और छोटी-छोटी बातों में भी अधीरता बढ़ सकती है।
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फैसले लेने पर असर
ज्यादा स्क्रीन टाइम का एक असर यह भी है कि हम अपनी सोच के बजाय दूसरों की राय पर ज्यादा निर्भर होने लगते हैं। सोशल मीडिया पर जो दिखता है वही सही लगने लगता है। इससे खुद से सोचने और निर्णय लेने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है।
नींद और मूड पर असर
रात में ज्यादा देर तक स्क्रीन देखने से दिमाग को आराम नहीं मिल पाता। इसका असर नींद पर पड़ता है और जब नींद पूरी नहीं होती तो इसका सीधा असर हमारे मूड और सोच पर दिखाई देता है। चिड़चिड़ापन और थकान बढ़ने लगती है।
हर स्क्रीन टाइम खराब ?
यह समझना जरूरी है कि हर स्क्रीन टाइम नुकसानदायक नहीं होता। अगर आप कुछ नया सीख रहे हैं, काम कर रहे हैं या जरूरी जानकारी ले रहे हैं, तो यह फायदेमंद भी हो सकता है। समस्या तब होती है जब बिना जरूरत के घंटों स्क्रीन पर समय बिताया जाता है।
कैसे रखें संतुलन
स्क्रीन टाइम को पूरी तरह खत्म करना जरूरी नहीं है लेकिन संतुलन बनाना बहुत जरूरी है। दिन में कुछ समय बिना स्क्रीन के बिताना, सोने से पहले फोन से दूरी रखना और जरूरत के हिसाब से ही स्क्रीन का इस्तेमाल करना – ये छोटी-छोटी आदतें बड़ा फर्क ला सकती हैं। ज्यादा स्क्रीन टाइम धीरे-धीरे हमारी सोच, आदतों और व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।

