नई दिल्ली। भारत इस समय वैश्विक स्तर पर हो रहे ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) के केंद्र में है। जिस तेजी से जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां बढ़ी हैं, उसने विकासशील देशों को अपनी परिवहन नीतियों पर पुनर्विचार करने को मजबूर कर दिया है।
इसी कड़ी में भारत ने ‘इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) कॉरिडोर’ के माध्यम से अपनी सड़कों को न केवल सुरक्षित बल्कि ‘शून्य-उत्सर्जन’ (जीरो-इमिशन) बनाने की दिशा में एक बड़ी छलांग लगाई है। वर्ष 2025-26 तक देश भर में 27,000 से अधिक सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशनों की स्थापना और प्रमुख राजमार्गों का विद्युतीकरण इस बात का प्रमाण है कि भविष्य की यात्रा अब धुआं उड़ाने वाली गाड़ियों की नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा की होगी।
ईवी कॉरिडोर का सीधा अर्थ उन प्रमुख राजमार्गों या सड़कों से है, जहाँ एक निश्चित दूरी (हर 5 से 10 किमी) पर फास्ट-चार्जिंग स्टेशन और बैटरी स्वैपिंग की सुविधाएं उपलब्ध हों। लंबी दूरी की यात्रा में इलेक्ट्रिक वाहनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘रेंज की चिंता’ (Range Anxiety) यानी बैटरी खत्म होने का डर रही है। ईवी कॉरिडोर इसी डर को खत्म करने का समाधान है। अब दिल्ली-जयपुर, दिल्ली-आगरा और मुंबई-पुणे जैसे व्यस्त मार्गों पर यात्री बिना रुके और बिना किसी तकनीकी तनाव के सफर कर सकते हैं।
केंद्र सरकार और राज्य सरकारों का जोर अब केवल भौतिक चार्जिंग पॉइंट बनाने पर ही नहीं, बल्कि एक सुदृढ़ डिजिटल इकोसिस्टम खड़ा करने पर भी है। ‘यूनिफाइड भारत ई-चार्ज’ जैसे डिजिटल सिस्टम इसी दिशा में बढ़ते कदम हैं, जो चार्जिंग के अनुभव को आसान, विश्वसनीय और पारदर्शी बनाएंगे।
इन कॉरिडोरों को ‘जीरो-एमिशन हाईवे’ कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा। परिवहन क्षेत्र भारत में कार्बन उत्सर्जन के प्रमुख स्रोतों में से एक है। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने से न केवल वायु गुणवत्ता (Air Quality) में सुधार होगा, बल्कि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता भी कम होगी। विशेष बात यह है कि कई आधुनिक ईवी कॉरिडोर अब सौर ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित हो रहे हैं। यानी, न केवल वाहन धुआं नहीं छोड़ रहा, बल्कि उसे चार्ज करने वाली बिजली भी कोयले के बजाय स्वच्छ स्रोतों से आ रही है। यह चक्र पर्यावरण संरक्षण के लिए एक वरदान की तरह है।
भारत में ईवी कॉरिडोर का नेटवर्क अब महज़ कागजी योजना नहीं, बल्कि धरातल पर उतरती सच्चाई है। मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे देश का पहला समर्पित इलेक्ट्रिक हाईवे बन चुका है। इसी तरह, दिल्ली-गुरुग्राम-जयपुर (NH48) और यमुना एक्सप्रेसवे को दुनिया के सबसे लंबे ई-हाईवे के रूप में विकसित किया जा रहा है, जो लगभग 500 किमी से अधिक लंबा होगा। इसके अलावा, 1,386 किमी लंबा दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे देश के सबसे महत्वाकांक्षी ई-हाईवे प्रोजेक्ट्स में से एक है। उत्तर प्रदेश के कानपुर में 500 एकड़ भूमि पर बन रहा ‘ईवी पार्क’ और दक्षिण में बेंगलुरु-चेन्नई एक्सप्रेसवे भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किए जा रहे हैं।
ईवी कॉरिडोर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं हैं, इनके आर्थिक लाभ भी व्यापक हैं। पारंपरिक पेट्रोल-डीजल वाहनों की तुलना में इलेक्ट्रिक वाहनों की परिचालन और रखरखाव लागत काफी कम होती है। मध्यम और लंबी अवधि में यह आम जनता और माल ढुलाई करने वाली कंपनियों (लॉजिस्टिक्स) के लिए बड़ी बचत साबित होगी। साथ ही, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास, बैटरी विनिर्माण और डिजिटल तकनीकी सेवाओं के क्षेत्र में निवेश और रोजगार के नए द्वार खुलेंगे।
ईवी कॉरिडोर का विस्तार भारत के ‘सस्टेनेबल’ यानी टिकाऊ भविष्य की नींव है। हालांकि, अभी भी चार्जिंग की गति, बिजली की निरंतर उपलब्धता और बैटरी डिस्पोजल जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं, लेकिन सरकार और निजी क्षेत्र का साझा प्रयास उम्मीद जगाता है। यदि हम इसी गति से आगे बढ़ते रहे, तो आने वाले वर्षों में भारत के राजमार्ग केवल सड़कों के जाल नहीं होंगे, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा और आधुनिक तकनीक के जीवंत उदाहरण होंगे। यह हरित परिवहन की दिशा में एक ऐसा नवीन प्रयोग है, जो आने वाली पीढ़ियों को एक प्रदूषण मुक्त और सुरक्षित पर्यावरण उपहार में देगा।
-केवल कृष्ण सलूजा
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