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जनविश्वास से जनप्रतिनिधित्व तक : संसद की नई कसौटी

Loksabha Debate

Loksabha Debate

From public trust to public representation : लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति चुनाव नहीं, संवाद है। चुनाव सत्ता तय करते हैं, लेकिन संवाद लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखता है। यही संवाद संसद में आकार लेता है, जहाँ केवल विधेयकों पर बहस नहीं, बल्कि राष्ट्र की दिशा, समाज की प्राथमिकताएँ और भविष्य की रूपरेखा तय होती है। संसद केवल भवन नहीं, बल्कि जनविश्वास का सजीव मंच है, जहाँ करोड़ों नागरिकों की आशाएँ, असहमतियाँ और आकांक्षाएँ राष्ट्रीय संकल्प में बदलती हैं।

गरिमा भवन से नहीं, जवाबदेही से

उसकी गरिमा भवन से नहीं, बल्कि विचारशीलता, संवेदनशीलता और जवाबदेही से निर्मित होती है। 30 जून का अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस इसी भावना का स्मरण कराता है। यह संसदों का उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है—यह परखने का कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ सचमुच हर नागरिक की आवाज़ को समान सम्मान दे रही हैं। इस दिवस की सबसे बड़ी प्रासंगिकता यही है कि यह संसदों को उनकी मूल भूमिका का स्मरण कराता है। संसदें केवल कानून बनाने वाली संस्थाएँ नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नैतिक चेतना हैं। किसी राष्ट्र का लोकतांत्रिक स्तर कानूनों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी न्यायपूर्ण, समावेशी और दूरदर्शी प्रकृति से तय होता है। (from-public-trust-to-public-representation) जब संसद में बहस की जगह शोर, संवाद की जगह ध्रुवीकरण और जनसरोकारों पर राजनीति हावी हो जाती है, तब लोकतंत्र का वास्तविक उद्देश्य कमजोर पड़ने लगता है। संसद की सफलता सत्ता और विपक्ष की जीत-हार में नहीं, बल्कि उस वातावरण में निहित है जहाँ असहमति का सम्मान हो और निर्णय जनता के व्यापक हित में लिए जाएँ।

लोकतंत्र के सामने चुनौती प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता

आज लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता है। समाज जितना विविध है, संसदें भी उतनी ही समावेशी होनी चाहिए। महिलाओं, युवाओं, आदिवासी समुदायों, दलितों, दिव्यांगजनों और वंचित वर्गों की भागीदारी केवल संवैधानिक औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता की कसौटी है। जब निर्णय प्रक्रिया में सभी वर्ग सहभागी होते हैं, तभी नीतियाँ अधिक न्यायपूर्ण और संतुलित बनती हैं। यदि आधी आबादी की आवाज़ प्रभावी रूप से शामिल न हो और विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी सीमित प्रतिनिधित्व तक सिमट जाए, तो लोकतंत्र का दायरा स्वतः संकुचित हो जाता है। समावेशिता राजनीतिक नारा नहीं, लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्य शर्त है। वर्ष 2026 में यह दिवस ‘मानवाधिकारों को केंद्र में लाने’ के वैश्विक संकल्प को रेखांकित करता है। (from-public-trust-to-public-representation)

लक्ष्यों की सफलता संसदों पर निर्भर

साथ ही, संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों की सफलता भी संसदों की सक्रियता पर निर्भर करती है, क्योंकि नीतियाँ वहीं बनती हैं, संसाधनों का वितरण वहीं तय होता है और सरकारों की जवाबदेही भी वहीं सुनिश्चित होती है। यदि संसद शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, रोजगार, जलवायु परिवर्तन और सामाजिक समानता जैसे मुद्दों पर गंभीर, सतत और परिणामोन्मुख विमर्श का केंद्र नहीं बनेगी, तो विकास केवल आँकड़ों तक सिमट जाएगा। किसी भी राष्ट्र का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब उसकी संसद तात्कालिक राजनीति से ऊपर उठकर भावी पीढ़ियों के हित में दूरदर्शी निर्णय लेने का साहस दिखाए। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत की जिम्मेदारी और भी बड़ी है। भारतीय संसद केवल संविधान की संरक्षक नहीं, बल्कि 145 करोड़ से अधिक नागरिकों की आकांक्षाओं की प्रतिनिधि भी है। हाल के वर्षों में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, डिजिटल संसदीय व्यवस्था और अनेक सामाजिक सुधारों से जुड़े कानूनों की दिशा में महत्त्वपूर्ण पहल हुई है। (from-public-trust-to-public-representation)

विधायी गुणवत्ता के क्षेत्र में यात्रा शेष

फिर भी प्रतिनिधित्व, संसदीय उत्पादकता, सार्थक बहस और विधायी गुणवत्ता के क्षेत्र में अभी लंबी यात्रा शेष है। संसद तब सबसे प्रभावशाली बनती है, जब वहाँ संख्याबल नहीं, विचारों का बल प्रबल हो और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर राष्ट्रीय हित सर्वोच्च प्राथमिकता बने। आज तकनीक ने लोकतंत्र को नई संभावनाएँ दी हैं। संसदीय कार्यवाही अब लाखों नागरिकों तक तत्काल पहुँचती है, दस्तावेज़ डिजिटल हैं और सूचना अधिक सुलभ है। लेकिन तकनीकी आधुनिकीकरण मात्र से लोकतंत्र सशक्त नहीं होता; उसकी असली शक्ति जागरूक नागरिक सहभागिता है। संसद और समाज के बीच संवाद जितना गहरा होगा, लोकतंत्र उतना ही जीवंत बनेगा। नागरिकों की भूमिका केवल मतदान तक सीमित नहीं होनी चाहिए; उन्हें संसदीय बहसों, विधेयकों और जनहित के मुद्दों के प्रति भी सजग रहना होगा। लोकतंत्र दर्शक नहीं, सक्रिय नागरिकों से मजबूत होता है।

आज जनविश्वास सबसे बड़ी चुनौती

संसदों के सामने आज सबसे बड़ी चुनौतियों में एक है—जनविश्वास। दुनिया के अनेक लोकतंत्रों में राजनीतिक संस्थाओं पर नागरिकों का भरोसा घट रहा है। इसका समाधान नए कानूनों से अधिक पारदर्शिता, जवाबदेही और सतत जनसंवाद में है। संसद को सिद्ध करना होगा कि वह केवल सत्ता परिवर्तन का मंच नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास की सबसे विश्वसनीय संस्था है। जब वह जनता की समस्याओं को प्राथमिकता देती है, निर्णय प्रक्रिया को पारदर्शी बनाती है और आत्मसुधार का साहस दिखाती है, तभी लोकतंत्र में नागरिकों का विश्वास सुदृढ़ होता है। अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस यह भी स्मरण कराता है कि लोकतंत्र कभी पूर्ण नहीं होता; वह निरंतर विकसित होने वाली व्यवस्था है। बदलते समय के साथ संसदों को भी अपनी कार्यशैली, प्राथमिकताओं और दृष्टि में बदलाव लाना होगा।

लोकतंत्र की पहचान संसद पर निर्भर

कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु संकट, वैश्विक असमानता, साइबर सुरक्षा, बदलता रोजगार परिदृश्य और सामाजिक न्याय जैसी चुनौतियाँ पारंपरिक राजनीति से कहीं अधिक दूरदर्शी सोच की माँग करती हैं। यदि संसद समय रहते इन चुनौतियों के अनुरूप नीतियाँ गढ़ेगी, तभी लोकतंत्र आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक और सशक्त बना रहेगा। लोकतंत्र की पहचान उसकी संसद से होती है। संसद केवल कानून बनाने वाली संस्था नहीं, बल्कि राष्ट्र के लोकतांत्रिक चरित्र का दर्पण है। वह जितनी संवेदनशील होगी, समाज उतना ही न्यायपूर्ण; जितनी समावेशी होगी, विकास उतना ही संतुलित; और जितनी जवाबदेह होगी, नागरिकों का विश्वास उतना ही गहरा होगा। इसलिए 30 जून केवल स्मृति-दिवस नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रति सामूहिक पुनर्संकल्प का अवसर है। यह स्मरण कराता है कि संसद की सबसे बड़ी उपलब्धि सत्ता संचालन नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति तक न्याय, सम्मान और अवसर पहुँचाना है। जब संसद हर नागरिक की आवाज़ को निर्णयों में स्थान देगी, तभी लोकतंत्र संविधान की परिभाषा नहीं, बल्कि राष्ट्रजीवन का सबसे विश्वसनीय अनुभव बनेगा।

-कृति आरके जैन

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