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उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले बिछने लगी बिसात, माया-चंद्र-ओवैसी आएंगे साथ ?

Mayawati, Chandra and Owaisi come together : लखनऊ। उत्तर प्रदेश में चुनाव में कुछ समय शेष है। इसके बावजूद चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi के हालिया बयानों ने इन अटकल को हवा दी है कि क्या दलित, पिछड़े और मुस्लिम वोटों को एक मंच पर लाने की कोई नई कोशिश शुरू हो सकती है।

ओवैसी बोले- अब दरी बिछाने की राजनीति नहीं

राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि क्या मायावती की बसपा, चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी और ओवैसी की एआईएमआईएम किसी साझा रणनीति पर विचार कर सकती हैं। अभी तक किसी औपचारिक गठबंधन के संकेत नहीं मिले हैं, लेकिन बदलते राजनीतिक हालात और वोट बैंक की नई गणित ने उत्तर प्रदेश की चुनावी बिसात पर संभावित नए समीकरणों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ओवैसी का यह कहना कि अब दरी बिछाने की राजनीति नहीं होगी, हिस्सेदारी और बराबरी की लड़ाई होगी। इस बात का संकेत माना जा रहा है कि ओवैसी अब सिर्फ चुनावी मौजूदगी दर्ज कराने नहीं, बल्कि सत्ता की राजनीति में वास्तविक हिस्सेदारी हासिल करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

एआईएमआईएम मांग रहा सम्मानजनक साझेदारी

बहराइच के मटेरा में आयोजित जनसभा में ओवैसी ने साफ कर दिया कि उनकी पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे को केंद्र में रखेगी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई भाजपा को रोकना चाहता है तो एआईएमआईएम सम्मानजनक साझेदारी के लिए तैयार है। यह बयान केवल एक राजनीतिक संदेश नहीं, बल्कि संभावित गठबंधन की दिशा में फेंका गया संकेत भी माना जा रहा है। यही कारण है कि अब राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या उत्तर प्रदेश में दलित-मुस्लिम समीकरण को नया रूप देने की कोशिश शुरू हो चुकी है? क्या ओवैसी, बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती और आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद भविष्य में किसी साझा राजनीतिक मंच पर आ सकते हैं? दरअसल, तीनों नेताओं की राजनीति का एक साझा बिंदु है- प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय का सवाल। मायावती लंबे समय से दलित राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा रही हैं।

चंद्रशेखर बना चुके युवा दलितों में पहचान

चंद्रशेखर आजाद युवा दलित मतदाताओं के बीच अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। दूसरी ओर ओवैसी लगातार मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बड़ा मुद्दा बनाते रहे हैं। ऐसे में यदि सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के आधार पर देखा जाए तो इन तीनों के बीच संवाद की संभावनाओं से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। रास्ता आसान नहीं है। मायावती अब तक किसी भी बड़े गठबंधन को लेकर बेहद सतर्क रही हैं। बसपा की रणनीति हमेशा स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखने की रही है। चंद्रशेखर आजाद भी खुद को केवल दलित नेता के रूप में सीमित नहीं रखना चाहते और व्यापक विपक्षी राजनीति में अपनी भूमिका तलाश रहे हैं। ओवैसी की मौजूदगी भी कई विपक्षी दलों के लिए असहजता का कारण बनती रही है, क्योंकि उन पर भाजपा को अप्रत्यक्ष फायदा पहुंचाने के आरोप लगते रहे हैं।

ओवैसी ने बोला था अखिलेश पर तीखा हमला

अपने भाषण में ओवैसी ने समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने बंगाल की राजनीति का जिक्र करते हुए विपक्षी दलों की रणनीतियों पर सवाल उठाए। इससे यह संकेत भी मिलता है कि फिलहाल एआईएमआईएम की दूरी सपा से बनी है और वह खुद को एक स्वतंत्र राजनीतिक धुरी के रूप में स्थापित करना चाहती है। ओवैसी ने मुख्यमंत्री योगी की सरकार पर कानून व्यवस्था, बुलडोजर कार्रवाई और अल्पसंख्यकों के साथ कथित भेदभाव पर हमला बोला। साथ ही अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर प्रधानमंत्री को भी घेरा। ईरान-ओमान समुद्री क्षेत्र में भारतीय नागरिकों की मौत का मुद्दा उठाकर उन्होंने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर सवाल खड़े किए और मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश की। उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा के खिलाफ विपक्षी वोटों के बिखराव को रोकने की चर्चा तेज हो रही है।

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