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शिक्षा बन रही दंश : बच्चों के भविष्य की कीमत पर बिक रहा है मां-बाप का आज

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नई दिल्ली। टूटी नींदों और अधूरी मुस्कानों के बीच पलता सच आज अभिभावकों की कठोर हकीकत बन चुका है। जब समाज अभिभावकों की भूमिका को नए नजरिए से देखेगा, तब एक जून को संयुक्त राष्ट्र की ओर से मनाए जा रहे अंतर्राष्ट्रीय अभिभावक दिवस की थीम ‘अभिभावकों के लिए एकजुट’ कोई साधारण थीम नहीं, बल्कि समाज की नींव को हिला देने वाली सच्चाई बनेगा।

माता-पिता आज साध रहे संतुलन

आज माता-पिता अकेलेपन, डिजिटल दबाव और बढ़ती अपेक्षाओं के बीच संतुलन साध रहे हैं। परिवार ढांचे कमजोर हो रहे हैं और बचपन स्क्रीन में खोता जा रहा है। ऐसे में अभिभावक केवल देखभालकर्ता नहीं, भविष्य के निर्माता हैं। यह दिन स्पष्ट करता है कि बच्चों की नींव शिक्षा नहीं, बल्कि साझा सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी पर टिकी है। अभिभावकत्व आज एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है जहां दबाव और जिम्मेदारियां पहले से कहीं अधिक तीव्र हैं। बच्चे अब घर और स्कूल तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी तरह डिजिटल दुनिया के हिस्सेदार बन गए हैं।

बदल रहे ट्रेंड्स, सोच और व्यवहार

सोशल मीडिया, गेमिंग और ऑनलाइन ट्रेंड्स उनके सोच और व्यवहार को गहराई से बदल रहे हैं। ऐसे समय में माता-पिता केवल अनुशासनकर्ता नहीं, बल्कि मार्गदर्शक, तकनीकी साथी और भावनात्मक सहारा बन गए हैं। इस दोहरी भूमिका में वे अक्सर मानसिक थकान और अपराधबोध महसूस करते हैं। समाज की आदर्श माता-पिता की अपेक्षा उनका आत्मविश्वास कमजोर करती है। इसलिए आज सबसे अधिक जरूरत सामूहिक समर्थन की है। इतिहास साक्षी है कि हर सभ्यता की नींव मजबूत अभिभावकत्व पर टिकी रही है। जब परिवार जुड़े हुए थे, तब समाज भी अधिक स्थिर और संवेदनशील था।

नैतिक मूल्यों से जोड़ता है अनुशासन

दादा-दादी की कहानियाँ, माता-पिता का अनुशासन और सामुदायिक जीवन बच्चों को नैतिक मूल्यों से जोड़ते थे। संयुक्त परिवार की व्यवस्था बच्चों को नैतिक मूल्यों, भावनात्मक सुरक्षा और सांस्कृतिक निरंतरता प्रदान करती थी। आज यह ढांचा तेजी से टूट रहा है और पीढ़ियों के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। बच्चे भौतिक रूप से समृद्ध हैं, पर भीतर से असंतुलित हो रहे हैं। अभिभावक अकेले इस खालीपन को भरने की कोशिश कर रहे हैं, जो अब लगभग असंभव चुनौती बनता जा रहा है। इसलिए सामूहिक जिम्मेदारी और सामाजिक भागीदारी को फिर से मजबूत करना जरूरी है, ताकि बच्चों का संतुलित विकास संभव हो सके।

अर्थव्यवस्था बढ़ा रही जिम्मेदारी का बोझ

आज की बदलती अर्थव्यवस्था और तेज़ रफ्तार कार्यसंस्कृति ने अभिभावकों पर जिम्मेदारियों का बोझ कई गुना बढ़ा दिया है। माता और पिता दोनों ही रोजगार की अनिश्चितता और लंबे कार्यघंटों के बीच संतुलन साधने को संघर्षरत हैं। ऐसे में बच्चों के साथ समय बिताना लगातार कठिन होता जा रहा है। तकनीक ने भले ही काम को सरल बनाया हो, लेकिन उसने व्यक्तिगत संबंधों में दूरी भी बढ़ाई है। अब माता-पिता केवल आर्थिक सुरक्षा देने वाले नहीं, बल्कि भावनात्मक स्थिरता का आधार भी बन गए हैं।

परिवारों में घट रहा संवाद

यह दोहरी भूमिका उन्हें निरंतर दबाव में रखती है। परिणामस्वरूप परिवारों में संवाद घट रहा है और भावनात्मक दूरी बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में सामुदायिक सहयोग और लचीली कार्यनीतियाँ बेहद जरूरी हो गई हैं। आज की बदलती दुनिया में यह स्पष्ट हो चुका है कि ‘अभिभावकों के लिए एकजुट’ अब केवल नारा नहीं, बल्कि अनिवार्य आवश्यकता है। जब अभिभावक अकेले संघर्ष करते हैं, तो उसका असर सीधे बच्चों के भविष्य पर पड़ता है। बढ़ता तनाव, मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएँ और डिजिटल निर्भरता ने इस स्थिति को और गंभीर बना दिया है।

सामूहिक प्रयास ही बढ़ाएंगे आगे

इस थीम का उद्देश्य केवल जागरूकता नहीं, बल्कि एक ऐसा सहयोग तंत्र बनाना है जहाँ हर व्यक्ति अभिभावकों के साथ खड़ा हो। शिक्षक, पड़ोसी, नीति-निर्माता और कार्यस्थल मिलकर परिवारों को मजबूती दें। यही सामूहिक प्रयास आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और संतुलित जीवन दे सकता है। दुनिया के हर कोने में माता-पिता की पीड़ा एक जैसी दिखाई देती है, चाहे देश या संस्कृति कोई भी हो। आर्थिक अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन, सामाजिक विभाजन और तेज़ तकनीकी बदलाव ने परिवारों को गहराई से प्रभावित किया है। हर जगह अभिभावक अपने बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

मानसिक तनाव और समय बन रहा समस्या

विकसित और विकासशील दोनों ही देशों में मानसिक तनाव और समय की कमी एक सामान्य समस्या बन चुकी है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और अनुभवों का आदान-प्रदान अत्यंत आवश्यक हो जाता है। यदि देशों के बीच सीख साझा की जाए, तो अभिभावकत्व की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सकता है। परंपरा और आधुनिकता के बीच खड़ा अभिभावक आज संतुलन की कठिन राह पर चल रहा है। एक ओर उसे बच्चों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है, तो दूसरी ओर उन्हें वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना है।

आज चुनौतीपूर्ण है संतुलन

यह संतुलन बेहद चुनौतीपूर्ण है क्योंकि दोनों दिशाओं का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। परंपरागत मूल्य अनुशासन और सामूहिकता सिखाते हैं, जबकि आधुनिक शिक्षा स्वतंत्र सोच और नवाचार को बढ़ावा देती है। अभिभावक इन दोनों के बीच सेतु की भूमिका निभाते हैं। यदि यह संतुलन बिगड़ जाए, तो बच्चों का व्यक्तित्व प्रभावित हो सकता है। इसलिए अभिभावकों के लिए निरंतर सीखना और समय के साथ स्वयं को बदलना आवश्यक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ की रिपोर्ट्स भी बार-बार चेतावनी दे रही हैं कि माता-पिता के बढ़ते तनाव का सीधा असर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और विकास पर पड़ रहा है।

अनदेखी है अभिभावकों की मेहनत

वह अनदेखी मेहनत जो हर सुबह दुनिया को संभालती है, वही अभिभावक हैं। अंतर्राष्ट्रीय अभिभावक दिवस केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। यह हमें याद दिलाता है कि अभिभावक समाज की वह रीढ़ हैं जो भविष्य को आकार देते हैं। यदि उन्हें अकेला छोड़ दिया गया, तो उसका असर पूरी पीढ़ी पर पड़ेगा। इसलिए ‘अभिभावकों के लिए एकजुट’ केवल विचार नहीं, बल्कि व्यवहारिक क्रांति बननी चाहिए। हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह अपने आसपास के माता-पिता का सहयोग करे और उनके संघर्ष को समझे। शिक्षा, नीति और समाज को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा जहाँ अभिभावक सम्मान, सहयोग और सुरक्षा महसूस कर सकें। यही आने वाले समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
-कृति आरके जैन

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