
अमृतसर: खालसा यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ लॉ की ओर से आधुनिक न्याय व्यवस्था में अल्टरनेटिव डिस्प्यूट रेजोल्यूशन सिस्टम (Alternative Dispute Resolution) की बढ़ती भूमिका को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भारत के साथ-साथ अमेरिका और ब्राजील से जुड़े न्यायिक एवं कानूनी क्षेत्र के विशेषज्ञों ने भाग लेकर विद्यार्थियों और कानून के पेशेवरों के साथ अपने अनुभव साझा किए।
सेमिनार का आयोजन स्कूल ऑफ लॉ के डीन प्रो. (डॉ.) जसपाल सिंह के मार्गदर्शन में हुआ। कार्यक्रम में जजों, अधिवक्ताओं, शिक्षाविदों और कानून के विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। वक्ताओं ने मध्यस्थता (Mediation), आर्बिट्रेशन (Arbitration) और विवादों के वैकल्पिक समाधान से जुड़े विभिन्न कानूनी एवं व्यावहारिक पहलुओं पर चर्चा की।
कार्यक्रम के प्रमुख वक्ता अमेरिका की J.A.M.S. (Judicial Arbitration and Mediation Services) से जुड़े प्रो. (डॉ.) सुखसिमरनजीत सिंह रहे। उन्होंने बताया कि दुनिया भर में न्याय व्यवस्था तेजी से ऐसे विकल्पों की ओर बढ़ रही है, जिनके माध्यम से विवादों का समाधान अदालतों में लंबी कानूनी प्रक्रिया के बजाय मध्यस्थता और आर्बिट्रेशन के जरिए किया जा सके। उन्होंने कानून के विद्यार्थियों को इस क्षेत्र में विशेषज्ञता विकसित करने की सलाह दी और इसके बढ़ते शैक्षणिक एवं पेशेवर अवसरों पर प्रकाश डाला।
J.A.M.S. अमेरिका की जस्टिस वैनेसा ज़कर ने कोर्ट-एनेक्स्ड मीडिएशन की अमेरिकी व्यवस्था का उदाहरण देते हुए बताया कि यदि विवादों का समाधान मुकदमे की लंबी प्रक्रिया शुरू होने से पहले किया जाए, तो न्यायालयों पर मामलों का दबाव कम किया जा सकता है। इससे संबंधित पक्षों को भी अपेक्षाकृत कम समय में विवाद का समाधान प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
ब्राजीलियाई लेबर कोर्ट के जस्टिस फर्नांडो हॉफमैन ने श्रम एवं औद्योगिक विवादों के निपटारे में आर्बिट्रेशन की उपयोगिता पर अपने विचार रखे। उन्होंने इस व्यवस्था के व्यावहारिक पक्षों और इसके प्रभावी इस्तेमाल से जुड़े अनुभवों को विद्यार्थियों के साथ साझा किया।
भारत के सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता जसबीर कौर ने देश में मध्यस्थता के बढ़ते महत्व पर चर्चा करते हुए बताया कि बदलती न्यायिक आवश्यकताओं के बीच विवादों के वैकल्पिक समाधान की व्यवस्था लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। वहीं रयात बहरा यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति प्रो. (डॉ.) दलजीत सिंह ने कानून की शिक्षा में ADR को अधिक प्रभावी ढंग से शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
स्कूल ऑफ लॉ के डीन प्रो. (डॉ.) जसपाल सिंह ने कहा कि अदालतों में लंबित मामलों का बढ़ता दबाव न्याय प्रणाली के सामने एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में मध्यस्थता और आर्बिट्रेशन जैसे विकल्प विवादों के समाधान को अधिक समयबद्ध, किफायती और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को ADR के क्षेत्र में उपलब्ध करियर, शोध और व्यावसायिक संभावनाओं से भी अवगत कराया।
सेमिनार के दौरान आयोजित संवादात्मक सत्र में विद्यार्थियों और कानूनी पेशेवरों ने विशेषज्ञों से कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे। इनमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिए गए आर्बिट्रल अवॉर्ड्स की मान्यता, उन्हें लागू कराने की कानूनी प्रक्रिया तथा मध्यस्थता से जुड़े नैतिक मुद्दे प्रमुख रहे। विशेषज्ञों ने सवालों का विस्तार से उत्तर देते हुए विद्यार्थियों को इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. मोहित सैनी ने आयोजन से जुड़ी जिम्मेदारियों का संचालन किया। इस अवसर पर डॉ. गुनीशा सलूजा, डॉ. सीमा रानी, डॉ. दिव्या शर्मा, डॉ. पूर्णिमा खन्ना, डॉ. पवनदीप कौर, डॉ. अनीता शर्मा, डॉ. उत्कर्ष सेठ, प्रो. मानसीरत, प्रो. जसदीप सिंह, प्रो. प्रेरणा सिंह, प्रो. प्रवीण कौर, प्रो. हेमा सिंह, प्रो. सहजप्रीत कौर सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
सेमिनार के दौरान वक्ताओं ने विद्यार्थियों से कानून के क्षेत्र में केवल अकादमिक ज्ञान तक सीमित न रहने, बल्कि पेशेवर दक्षता, कानूनी नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण विकसित करने का आह्वान किया।
सेमिनार के बाद अमेरिका से आए कानूनी विशेषज्ञों के प्रतिनिधिमंडल ने खालसा यूनिवर्सिटी तथा खालसा कॉलेज परिसर का दौरा भी किया। प्रतिनिधिमंडल ने संस्थानों की शैक्षणिक गतिविधियों और परिसर से संबंधित जानकारी हासिल की तथा विश्वविद्यालय के साथ अकादमिक एवं कानूनी क्षेत्र में संभावित सहयोग की संभावनाओं पर भी चर्चा की।