-
सलोक मः ३ ॥ जगतु जलंदा रखि लै आपणी किरपा धारि ॥ जितु दुआरै उबरै तितै लैहु उबारि ॥ सतिगुरि सुखु वेखालिआ सचा सबदु बीचारि ॥ नानक अवरु न सुझई हरि बिनु बखसणहारु ॥१॥ {पन्ना 853}पद्अर्थ: जलंदा = (विकारों में) जलता। रखि लै = बचा ले। धारि = धारण करके। जितु दुआरै = जिस दर.