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बदलते परिवेश में त्यौहारों का स्वरूप भी बदल गया है। वह समय लद गया जब बच्चे गलियों में झुंडों के झुंड लोहड़ी के गीत गाते और घर-घर जाकर लोहड़ी मांगते। हर घर से कुछ न कुछ जो भी मिलता, उसे लेकर घर को दुआएं देकर अगला दरवाजा खटखटा देते। वैसे तो दरवाजा खटखटाने की जरूरत.