Last Updated: September 22, 2026

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संतोष से दूर, संकट के निकट : परिवार की बदलती कहानी

June 21, 2026

संतोष से दूर, संकट के निकट : परिवार की बदलती कहानी

Far from contentment, near crisis : जब संबंधों की जड़ें स्वार्थ की धूप में सूखने लगती हैं, तब सभ्यताओं का मौन पतन शुरू हो जाता है। भारतीय समाज आज उसी सांस्कृतिक क्षरण के दौर से गुजर रहा है, जहाँ त्याग, मर्यादा और आत्मसंयम जैसे जीवन-मूल्य धीरे-धीरे भौतिक आकर्षणों की चमक में धुंधले पड़ते जा रहे हैं। विशेष रूप से दिगंबर जैन दर्शन का गृहस्थ-धर्म, जो संतुलित जीवन, नैतिक अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व का आदर्श रहा है, आधुनिक उपभोक्तावाद, मोह, लोभ और भोगवाद की प्रवृत्तियों से चुनौती का सामना कर रहा है।

कमजोर हो रही परिवारों की एकता

परिणामस्वरूप परिवारों की एकता, संबंधों की गरिमा और सांस्कृतिक परंपराओं की दृढ़ता कमजोर पड़ती दिखाई देती है। यह केवल एक धार्मिक या सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि उस मूल्य-व्यवस्था के संरक्षण का प्रश्न है जिसने भारतीय सभ्यता को सदियों तक स्थायित्व और नैतिक शक्ति प्रदान की है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (2019–21) की वास्तविकता चुभती है—शहरी भारत में एकल परिवार 70% तक पहुँचकर संयुक्त परिवारों का स्थान ले रहे हैं, और महानगरों में 30–40% तलाक दर रिश्तों की घटती आत्मीयता दर्शाती है। उपभोक्तावाद, सोशल मीडिया और व्यक्तिवादी सोच ने संयम व संतोष को विस्थापित कर दिया है, जिससे युवा सांस्कृतिक व आध्यात्मिक जड़ों से कटकर क्षणिक सुखों की दौड़ में खो रहे हैं। दिगंबर दृष्टि में यह परिग्रह की मूर्छा है, जो आत्मा को शुद्ध स्वरूप से दूर करती है। यह केवल सामाजिक विघटन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पतन है, जिसका उपचार अपरिग्रह, अहिंसा और सम्यक चारित्र में निहित है।

बिगड़ती संस्कृति और बिखरते परिवारों के कारण

जब घरों में संवाद की जगह चुप्पियाँ बोलने लगें और अपनापन यंत्रों की चमक में धुंधला जाए, तब परिवार बिखरने लगता है। शहरों की ओर भागती ज़िंदगी ने संयुक्त परिवारों को कमजोर किया है, और व्यस्तता ने बच्चों की भावनात्मक निकटता छीन ली है। मोबाइल और इंटरनेट ने लोगों को एक ही छत के नीचे अलग-अलग दुनिया में बाँट दिया है। पीढ़ियों का अंतर, आर्थिक दबाव, नशे की प्रवृत्ति और नैतिक गिरावट रिश्तों की नींव कमजोर कर रहे हैं। जब जीवन का केंद्र धन और सुख बन जाता है, तब रिश्ते उपयोग और बोझ बन जाते हैं। जैन दर्शन इसे आसक्ति और कर्म-बंधन की जकड़न मानता है, जहाँ आत्मा विकारों से ढक जाती है। मन की कटुता (भाव-हिंसा) घरों को मौन टकराव और टूटन की ओर ले जाती है।

जैन दर्शन में समाधान का

मार्ग संयम की संजीवनी

जब भीतर का संतुलन टूटने लगे और संबंधों की डोर ढीली पड़ जाए, तब जैन दर्शन जीवन को दिशा देता है। “अहिंसा परमो धर्मः” केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि चेतना को निर्मल करने वाली जीवन-धारा है, जो मन, वचन और कर्म से किसी जीव को कष्ट न देने का संकल्प कराती है। जहाँ परिवारों में करुणा, क्षमा और समभाव बने रहते हैं, वहाँ विघटन की गुंजाइश नहीं रहती। इसके विपरीत, भोग-लालसा और कामुक प्रवृत्तियाँ रिश्तों की पवित्रता क्षीण करती हैं। जैन गृहस्थ परंपरा में ब्रह्मचर्य को एकपत्नीत्व और इंद्रिय-संयम के रूप में माना गया है, जो विश्वास, मर्यादा और स्थायित्व का आधार बनता है। जब मनुष्य इंद्रियों पर संयम साध लेता है, तब परिवार बाहरी आकर्षणों से मुक्त होकर सुदृढ़ बन जाता है।

इच्छाओं का निर्वाण

जब “मेरा” और “मेरा ही” की पकड़ जीवन पर हावी होने लगे, तब जैन दर्शन का अपरिग्रह इच्छाओं के बंधन को विलीन करने वाली जागृति बन जाता है। यह त्याग नहीं, बल्कि वह स्थिति है जहाँ संतोष जीवन का आधार बनता है। अनियंत्रित संचय लालच, ईर्ष्या और तुलना को जन्म देकर परिवारों में तनाव और दूरी बढ़ाता है। तीर्थंकरों का संदेश है कि अनावश्यक संग्रह सबसे भारी बंधन है। आज जीवन दिखावे और “और चाहिए” की दौड़ में फँसकर संबंधों के लिए समय व संवेदना खो रहा है। अपरिग्रह इच्छाओं को सीमित कर संतोष जगाता है, व्यर्थ खर्च घटाता है और घरों में शांति लाता है। साथ ही, यह प्रकृति पर दबाव कम कर संतुलित सह-अस्तित्व को बढ़ावा देता है।

दृष्टि का विस्तार

सत्य को किसी एक खांचे में बंद कर देना जैन दर्शन के अनेकांतवाद और स्यादवाद की भावना के विपरीत है, क्योंकि यहाँ हर सत्य को अनेक कोणों से देखने की कला सिखाई जाती है। जब “मैं ही सही हूँ” की कठोरता टूटती है और “दूसरे दृष्टिकोण में भी सच्चाई हो सकती है” की स्वीकार्यता जन्म लेती है, तब घर-परिवार की छोटी-छोटी बहसें भी संवाद में बदल जाती हैं। यही दृष्टि पीढ़ियों के बीच जमी बर्फ पिघलाकर समझ का पुल बनाती है, जहाँ मतभेद टकराव नहीं बल्कि परस्पर सम्मान और संतुलन का आधार बन जाते हैं।

चरित्र की चेतना

जैन जीवन-दृष्टि का आधार त्रिरत्न—सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र—है, जो विचार, समझ और आचरण को शुद्ध करते हैं। जैन परिवारों में प्रातः-सायं पूजा, स्वाध्याय, उपवास और परोपकार की परंपराएँ बचपन से संस्कार विकसित करती हैं। श्रमण संस्कृति बाहरी आडंबरों से दूर रहकर आत्मशुद्धि और आत्मनिरीक्षण को सर्वोच्च स्थान देती है। अहिंसा और अपरिग्रह ने जैन समाज को नैतिकता, सम्मान और समृद्धि प्रदान की है। गृहस्थ जीवन में अणुव्रत—अहिंसा, अपरिग्रह आदि—इच्छाओं को नियंत्रित कर जीवन को सादगी और संस्कृति से जोड़ते हैं।

संस्कारों की पुनर्स्थापना

संरक्षण और संस्कार-निर्माण की दिशा आवश्यक है। बाल्यकाल से णमोकार मंत्र, जैन कथाएँ और महावीर स्वामी का जीवन बच्चों में संस्कार रूप में बसाया जाए। सामूहिक भोजन, संयुक्त प्रार्थना और पर्व-उत्सव पारिवारिक संबंधों को सुदृढ़ करते हैं। सोशल मीडिया का संयमित उपयोग, स्वाध्याय और उपवास जीवन में अनुशासन लाते हैं। शिक्षा में नैतिक मूल्यों और जैन सिद्धांतों का समावेश आवश्यक है। जैन संगठन परिवार परामर्श केंद्रों तथा संयुक्त परिवार व्यवस्था को बढ़ावा दें। ध्यान, क्षमा और समता की साधना भीतर शांति लाकर परिवार को विघ्नों से सुरक्षित रखती है।

वचन आज भी प्रकाशमान

आदर्शों की कसौटी पर जैन धर्म का यह वचन आज भी प्रकाशमान है—‘चरित्र ही धर्म है’। शुद्ध आचरण व्यक्ति, परिवार और संस्कृति की सबसे मजबूत ढाल है। संस्कृति का पतन आधुनिकता से नहीं, बल्कि मूल्यों के असंतुलन से होता है। जैन दर्शन अहिंसा से करुणा, अपरिग्रह से संतोष, संयम से स्थिरता और अनेकांत से सहिष्णुता का मार्ग दिखाता है। जब ये मूल्य जीवन में उतरते हैं, तो पीढ़ियाँ सुरक्षित रहती हैं। सशक्त परिवार संस्कृति की धुरी है। इसलिए इन मूल्यों को अपनाकर संतुलित और करुण समाज का निर्माण आवश्यक है, क्योंकि जैन दर्शन केवल रक्षा नहीं, उत्थान का मार्ग है।

-प्रो. आरके जैन

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