अंबाला। current to electricity consumers इस साल बिजली के बिलों में परिवर्तन नहीं होेने से जनता ने राहत की सांस ली थी। अब उत्तर और दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम नया खेल खेलने जा रहा है।
खटखटाया विनियामक आयोग का दरवाजा
इन्होंने ईंधन और बिजली खरीद समायोजन अधिभार के नाम पर 47 पैसे प्रति यूनिट की अतिरिक्त वसूली के लिए विनियामक आयोग का दरवाजा खटखटाया है। अगर आयोग इस प्रस्ताव पर मुहर लगाता है, तो मध्यम और उच्च आय वर्ग के उपभोक्ताओं के मासिक बिल में एक बड़ी उछाल देखने को मिलेगी। हरियाणा में साल 2022-23 से ही फ्यूल सरचार्ज एडजस्टमेंट से उपभोक्ताओं से वसूली की जा रही है।
दोहरी मार साबित होगा ये बिल
वर्तमान में जो उपभोक्ता 200 यूनिट से ज्यादा बिजली फूंकते हैं, उन्हें 47 पैसे प्रति यूनिट का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है। अब बिजली निगम इसी वसूली को नए नाम के साथ वित्त वर्ष 2025-26 के लिए भी जारी रखना चाहते हैं। हालांकि, 200 यूनिट से कम खपत वाले छोटे उपभोक्ताओं का खर्च पहले की तरह सरकार वहन करेगी, लेकिन मध्यम वर्ग के लिए यह दोहरी मार जैसा साबित होगा। प्रदेश में बिजली उत्पादन और आपूर्ति का काम दिन-ब-दिन महंगा होता जा रहा है।
प्रति यूनिट बढ़ गई खरीद की लागत
कोयले के दामों में अस्थिरता और पीक सीजन में बाहरी स्रोतों से महंगी बिजली खरीदने के कारण प्रति यूनिट लागत 7.35 रुपये से बढ़कर 7.48 रुपये पर पहुंच गई है। इस बढ़ती लागत का असर सीधे तौर पर सरकारी खजाने पर पड़ रहा है। आंकड़ों की मानें तो नए वित्त वर्ष में सरकार को करीब 1089 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी देनी होगी। कुल सब्सिडी का आंकड़ा अब 6782 करोड़ रुपये के पार जाने का अनुमान है, जो राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है।
सात लाख किसानों को मिल रही रियायती बिजली
प्रदेश के करीब 7 लाख किसानों के लिए बिजली दरें पहले की तरह ही रियायती रहेंगी। किसानों को ट्यूबवेल कनेक्शन के लिए मात्र 10 पैसे प्रति यूनिट का ही भुगतान करना होगा। दिलचस्प बात यह है कि इस साल किसानों के लिए बिजली की अनुमानित खपत को 9 हजार मिलियन यूनिट से बढ़ाकर 10 हजार मिलियन यूनिट कर दिया गया है। इस बिजली की वास्तविक लागत लगभग 7 हजार करोड़ रुपये बैठती है, जिसमें से किसान केवल 123 करोड़ रुपये चुकाएंगे और बाकी की भारी-भरकम राशि सरकार सब्सिडी के रूप में बिजली निगमों को देगी।
ये कहते हैं नियामक आयोग के नियम
बिजली नियामक आयोग के नियमों के मुताबिक, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले या अन्य ईंधन की कीमतें बढ़ती हैं, तो बिजली बनाने वाली कंपनियों की लागत बढ़ जाती है। वितरण कंपनियां घाटे में न जाएं, इसलिए आयोग उन्हें यह अधिकार देता है कि वे बढ़ा हुआ खर्च उपभोक्ताओं से वसूल सकें। अब देखना यह होगा कि 1 मई तक आने वाले सुझावों और आपत्तियों के बाद आयोग 14 मई को जनता को राहत देता है या बिजली निगमों की झोली भरता है।
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