Last Updated: September 21, 2026

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LPG की किल्लत को दूर करने के लिए भारत सरकार का बड़ा कदम, अमेरिका से खरीदी 1 लाख 76 हजार टन गैस

March 21, 2026

LPG की किल्लत को दूर करने के लिए भारत सरकार का बड़ा कदम, अमेरिका से खरीदी 1 लाख 76 हजार टन गैस

नेशनल डेस्क: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई पर साफ दिखाई देने लगा है। कई देशों को ईंधन की कमी का सामना करना पड़ रहा है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। इसी स्थिति को देखते हुए भारत ने बड़ा कदम उठाते हुए अमेरिका से करीब 1 लाख 76 हजार टन LPG की खरीद की है, ताकि देश में सप्लाई बनी रहे और लोगों को किसी तरह की परेशानी न हो।

एसएंडपी कमोडिटीज एट सी (CAS) की रिपोर्ट के मुताबिक, 19 मार्च को खत्म हुए सप्ताह में भारत का कुल LPG आयात घटकर 2,65,000 टन रह गया, जो 5 मार्च को 3,22,000 टन था। खास बात यह है कि पश्चिम एशिया से आने वाली सप्लाई में बड़ी गिरावट देखी गई है। 19 मार्च वाले सप्ताह में यह घटकर सिर्फ 89,000 टन रह गई, जो जनवरी 2026 के बाद सबसे कम स्तर है।

इस कमी को पूरा करने के लिए भारत अब दूसरे देशों की ओर रुख कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, 19 मार्च तक के सप्ताह में वैकल्पिक क्षेत्रों से LPG की सप्लाई बढ़कर 1,76,000 टन हो गई, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिका से आया है। अनुमान है कि भारत की तेल कंपनियां साल 2026 में अमेरिका से करीब 2.2 मिलियन टन एलपीजी आयात कर सकती हैं।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका से LPG लेकर आने वाले कुछ जहाज भारत पहुंच भी चुके हैं, हालांकि उनकी सटीक संख्या नहीं बताई गई है। अधिकारियों ने मौजूदा स्थिति को ‘चिंताजनक’ बताया है और कहा है कि देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए अब रूस और जापान जैसे देशों से भी गैस मंगाने की योजना बनाई जा रही है।

आपूर्ति के समय की बात करें तो पश्चिम एशिया से LPG भारत तक पहुंचने में करीब 7 से 8 दिन लगते हैं, जबकि अमेरिका से आने वाले कार्गो को लगभग 45 दिन का समय लगता है। वहीं रूस और जापान से सप्लाई आने में करीब 35 से 40 दिन लग सकते हैं। यही वजह है कि भारत को पहले से योजना बनाकर आयात करना पड़ रहा है।

भारत अपनी कुल LPG जरूरत का करीब 60 प्रतिशत आयात के जरिए पूरा करता है, जिसमें से लगभग 90 प्रतिशत सप्लाई अब तक पश्चिम एशिया से ही आती रही है। लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए भारत अब अपने स्रोतों में बदलाव कर रहा है, ताकि भविष्य में किसी तरह की कमी से बचा जा सके।

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