Last Updated: September 23, 2026

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आशावादी होना खराब निर्णय लेने का कारण बन सकता है: अध्ययन

January 1, 2024

आशावादी होना खराब निर्णय लेने का कारण बन सकता है: अध्ययन

लंदन: सकारात्मक सोच और आशावाद अक्सर जीवन में सफलता, अच्छे स्वास्थ्य व लंबी उम्र से जुड़े होते हैं; लेकिन, एक नए अध्ययन से पता चला है कि इससे खराब निर्णय लेने की क्षमता भी हो सकती है, इसका विशेष रूप से लोगों की वित्तीय भलाई पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।जर्नल पर्सनैलिटी एंड सोशल साइकोलॉजी बुलेटिन में प्रकाशित अध्ययन में, यूके स्थित यूनिवर्सटिी आफ बाथ के शोधकर्ताओं ने दिखाया कि अत्यधिक आशावाद वास्तव में कम संज्ञानात्मक कौशल जैसे कि मौखिक प्रवाह, तरल तर्क, संख्यात्मक तर्क और स्मृति से जुड़ा हुआ है।

जबकि जो लोग संज्ञानात्मक क्षमता में उच्च होते हैं, वे भविष्य के बारे में अपनी अपेक्षाओं में अधिक यथार्थवादी और निराशावादी दोनों होते हैं।यूनिवर्सटिी के स्कूल आफ मैनेजमेंट के डॉ. क्रिस डॉसन ने कहा,‘‘सटीकता के साथ भविष्यवाणी करना कठिन है और इस कारण से, हम उम्मीद कर सकते हैं कि कम संज्ञानात्मक क्षमता वाले लोग निराशावादी और आशावादी दोनों तरह के निर्णयों में अधिक त्रुटियां करेंगे। लेकिन परिणाम स्पष्ट हैं: कम संज्ञानात्मक क्षमता अधिक आत्म-चापलूसी वाले पूर्वाग्रहों को जन्म देती है, लोग अनिवार्य रूप से एक हद तक खुद को धोखा देते हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘अत्यधिक आशावादी विश्वासों पर आधारित योजनाएं खराब निर्णय लेती हैं और यथार्थवादी विश्वासों की तुलना में खराब परिणाम देने के लिए बाध्य होती हैं।‘शोधकर्ताओं के अनुसार, रोजगार, निवेश या बचत जैसे प्रमुख वित्तीय मुद्दों और जोखिम और अनिश्चितता से जुड़े किसी भी विकल्प पर निर्णय विशेष रूप से इस प्रभाव से ग्रस्त थे और व्यक्तियों के लिए गंभीर प्रभाव उत्पन्न करते थे।अध्ययन में 36,000 से अधिक घरों से डेटा लिया गया और लोगों की वित्तीय भलाई की अपेक्षाओं को देखा गया और उनकी तुलना उनके वास्तविक वित्तीय परिणामों से की गई।

अध्ययन में पाया गया कि संज्ञानात्मक क्षमता में उच्चतम लोगों ने ‘यथार्थवाद‘ की संभावना में 22 प्रतिशत की वृद्धि और ‘अत्यधिक आशावाद‘ की संभावना में 35 प्रतिशत की कमी का अनुभव किया।‘‘अवास्तविक आशावाद सबसे व्यापक मानवीय गुणों में से एक है और शोध से पता चला है कि लोग लगातार नकारात्मक को कम आंकते हैं और सकारात्मक को महत्व देते हैं। डॉसन ने कहा, ‘सकारात्मक सोच’ की अवधारणा लगभग निर्वविाद रूप से हमारी संस्कृति में अंतर्नििहत है, और उस विश्वास पर फिर से विचार करना स्वस्थ होगा।

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