Last Updated: October 1, 2026

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अब TMC पर दावा : तृणमूल के अस्तित्व पर संकट के बादल, जानें आगे क्या होगा?

June 23, 2026

अब TMC पर दावा : तृणमूल के अस्तित्व पर संकट के बादल, जानें आगे क्या होगा?

Now claim on TMC : कोलकाता। पश्चिम बंबाला की सत्ता के गलियारों में अब सिर्फ जंग कुर्सी और बहुमत की नहीं, बल्कि पहचान और अस्तित्व की है। लोकसभा के 20 सांसदों के पार्टी छोड़कर आईएनसीपी का दामन थामने और विधानसभा में तृणमूल के परिषदीय दल पर नियंत्रण कमजोर पड़ने के बाद अब सवाल उठने लगा है- आखिर असली तृणमूल कांग्रेस कौन है?

पार्टी के नाम तक पहुंचा विवाद

राजनीतिक खींचतान अब संगठन, पार्टी के नाम और चुनाव निशान तक पहुंच गई है, जिससे आने वाले दिनों में अदालत और चुनाव आयोग के दरवाजे खटखटाने की नौबत बन सकती है। विद्रोही खेमे ने नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में विशेष अधिवेशन बुलाकर समानांतर राष्ट्रीय कार्यसमिति का गठन कर दिया। इसमें विधायक अरूप राय को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष (Chairman) घोषित कर दिया। ऋतब्रत को महासचिव बनाया। इसके साथ ही उपाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों की भी नियुक्ति कर दी है। हालांकि ममता पक्ष इसे पूरी तरह अवैध बता रहा है।

तृणमूल और ममता एक-दूसरे के पर्याय : घोष

TMC के राज्य प्रवक्ता कुणाल घोष ने कहा कि तृणमूल और ममता बनर्जी एक-दूसरे के पर्याय हैं और पार्टी संविधान के अनुसार विद्रोही नेताओं को इस तरह का अधिवेशन बुलाने या नेतृत्व बदलने का कोई अधिकार नहीं है। आधिकारिक तृणमूल नेतृत्व ने बागी नेताओं को दल विरोधी गतिविधियों के आरोप में कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है। इसके जवाब में ऋतब्रत ने दावा किया कि पूरी प्रक्रिया कानून और पार्टी के नियमों के अनुरूप अपनाई गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह लड़ाई केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि पार्टी के नाम और वैधता की भी है।

विवाद कानूनी से ज्यादा राजनीतिक

परिषदीय दल और संगठन (पार्टी) अलग-अलग संस्थाएं हैं। परिषदीय दल में बहुमत होने का अर्थ यह नहीं कि संगठन पर भी स्वतः अधिकार मिल जाएगा। दूसरी ओर, यदि संगठन के बड़े हिस्से का समर्थन विद्रोहियों के साथ होने का दावा सही साबित होता है तो विवाद और जटिल हो सकता है। अधिवक्ता अरुणाभ घोष का मानना है कि यह विवाद जितना कानूनी है, उससे कहीं अधिक राजनीतिक है। उनके अनुसार सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी के बिना TMC की पहचान को जमीनी कार्यकर्ता स्वीकार करेंगे।

परिषदीय दल और संगठन अलग विषय

TMC सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी का कहना है कि परिषदीय दल और पार्टी संगठन दो अलग विषय हैं और फैसला अदालत ही करेगी। वामपंथी नेता और अधिवक्ता सब्यसाची चट्टोपाध्याय इसे सुनियोजित राजनीतिक रणनीति मानते हैं। उनके अनुसार विद्रोही खेमा तृणमूल के राजनीतिक आधार को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसी नाम और संगठनात्मक ढांचे को अपने नियंत्रण में लेकर आगे बढ़ना चाहता है। आने वाले दिनों में यह संघर्ष तीन स्तरों पर आगे बढ़ सकता है।

फिलहाल ये तीन सवाल अहम

पहला, पार्टी संगठन पर वास्तविक नियंत्रण किसके पास रहता है। दूसरा, अदालत इस समानांतर संगठन की वैधता को किस नजरिए से देखती है। तीसरा, चुनाव आयोग भविष्य में तृणमूल कांग्रेस के नाम, चुनाव चिह्न और आधिकारिक नेतृत्व को लेकर किस पक्ष को मान्यता देता है। इन तीनों सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि तृणमूल कांग्रेस पर अंतिम अधिकार किसका माना जाएगा।

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